धरती के सीने पे पत्ते भर भी नहीं
तुम कौन भई
तुम से ज़्यादा तो ये पेड़ पौधे गुफ़ा कंदराएं हुईं
तुम कौन भई
रोज़ मजमा लगाते हो
अपना गाना बजाते हो
अपना कहा - किया लगता सिर्फ़ तुम्हें सही
तुम कौन भई
इंसान बने बैठे हो
आका समझ के रखे हो
सच में सोचो अगर तुम
तो दिमाग़ सच में तुम पे है नहीं
तुम कौन भई
संख्या में तुम आए थे चार
फैल गए बन कर चालीस हज़ार
कब्ज़ा लिया है सबका हक़
कहने पर पड़ेगा रत्ती नहीं फ़र्क
तुम कौन भई
कभी खदानों में खोदते हो
कभी श्रृंखलाओं को तोड़ते हो
किस दंभ में जी रहे हो
क्यों धरती की छाती कूट रहे हो
रहना तुम्हें यहाँ 100-150 साल से ज़्यादा नहीं
धरती कहेगी फिर तुम कौन भई
संभलने का भी अब समय नहीं बचा है
इतना कचरा इंसानों ने बो दिया है
चाँद के सपने हैं देखते
दूर दराज़ की यात्राएं करते
आँखें पैनी कर रहे नए ग्रहों पर
चील कौव्वों से बैठे शाख पर
जो मिला था उसे तो बचा लो
अपने इंसान होने का फ़र्ज़ ही निभा लो
प्रकृति रो रही है
तुम्हीं को दया नहीं है
नहीं तुम कहीं पर सही
तुम कौन भई
तत्त्व ◉