Friday, December 19, 2025

तुम कौन भई?

तुम कौन भई 
धरती के सीने पे पत्ते भर भी नहीं
तुम कौन भई 
तुम से ज़्यादा तो ये पेड़ पौधे गुफ़ा कंदराएं हुईं 
तुम कौन भई 
रोज़ मजमा लगाते हो
अपना गाना बजाते हो
अपना कहा - किया लगता सिर्फ़ तुम्हें सही 
तुम कौन भई
इंसान बने बैठे हो
आका समझ के रखे हो
सच में सोचो अगर तुम
तो दिमाग़ सच में तुम पे है नहीं
तुम कौन भई
संख्या में तुम आए थे चार
फैल गए बन कर चालीस हज़ार 
कब्ज़ा लिया है सबका हक़ 
कहने पर पड़ेगा रत्ती नहीं फ़र्क 
तुम कौन भई 
कभी खदानों में खोदते हो
कभी श्रृंखलाओं को तोड़ते हो
किस दंभ में जी रहे हो
क्यों धरती की छाती कूट रहे हो
रहना तुम्हें यहाँ 100-150 साल से ज़्यादा नहीं
धरती कहेगी फिर तुम कौन भई
संभलने का भी अब समय नहीं बचा है
इतना कचरा इंसानों ने बो दिया है
चाँद के सपने हैं देखते
दूर दराज़ की यात्राएं करते
आँखें पैनी कर रहे नए ग्रहों पर
चील कौव्वों से बैठे शाख पर
जो मिला था उसे तो बचा लो
अपने इंसान होने का फ़र्ज़ ही निभा लो
प्रकृति रो रही है
तुम्हीं को दया नहीं है
नहीं तुम कहीं पर सही
तुम कौन भई

तत्त्व ◉

Wednesday, April 16, 2025

Sawan ke andhe

रेल यात्राओं का मज़ा बचपन से ही मेरे लिए ख़ास रहा है। अब यहां यह ज़ाहिर करना जरूरी जान पड़ता है कि रेल यात्राएं ग़ज़ब की रहेंगी ऐसा ज़रूरी नहीं है या आपका अनुभव हमेशा ही दिन में सपने सुहाने जैसा रहेगा, ऐसा मैं बिल्कुल नहीं कह रही हूं।

मुद्दे की बात यह है कि जब भी मैंने दिन में रेल यात्राएं की, देश हरा - भरा ही दिखाई दिया। कहीं लगा ही नहीं कि पर्यावरण या जलवायु परिवर्तन संबंधी समस्याओं का हम से कोई लेना - देना होगा।

अब इस बात को मैं क्या नाम दूं?
सावन के अंधे को सब हरा ही हरा दिखाई देता है क्या 😜

सस्नेह
निशु

दिमाग या नदी

किसे फिक्र है कि आसपास या ख़ुद के भीतर क्या चल रहा है?
लेकिन मैं जानती हूं कि जो चल रहा है वह कभी-कभी दिमाग को बिल्कुल सुस्त बना देता है 
दिमाग के भीतर एक छोटी सी नदी है और वह नदी लगातार बह रही है।
कभी थोड़ी सूख जाती है तो कभी फिर से उसमें पानी का स्तर बढ़ जाता है
कभी इसकी कलकल और कलरव से दिमाग को सुकून आता है
और कभी यही कलकल कोलाहल हो जाता है
दिमाग भी क्या चीज़ है
नदी की तरह लगातार बहता रहता है
फिर एक दिन ऐसा भी होगा कि न नदी रहेगी न दिमाग और न दिमाग को रखता ये शरीर

Wednesday, April 9, 2025

ek chhoti si khidki

एक छोटी सी खिड़की,
कितनी ही बड़ी होगी?
उतनी बड़ी जिससे एक पक्षी दिख सके,
एक पेड़ की एक नहीं दो नहीं कई डालियां दिख सके
और तो और पूरा पेड़ ही दिख सके
फिर ज़रा दूर छोटे बड़े मकानों का गुच्छा दिख सके
फिर और पेड़ों के झुरमुट में कलरव करते पंछी दिख सके
एक सुंदर गोल चमकता, गर्मियों में आग बरसाता 
और सर्दियों में ताप देता सूरज दिख सके
उस खिड़की में रास्ते पर चलती गाड़ियां, लोग, रेहड़ियां, बस ऑटो दिख सके,
उस खिड़की में जो प्रत्यक्ष दिखता है वो तो दिख ही सके
पर दिख सके अतीत की यादों का टोकरा और भविष्य को टटोलता मन मेरा 
खिड़की छोटी भले ही हो
लेकिन दृश्य परिदृश्य अनंत दिख सके