Wednesday, October 31, 2012

सफ़र की सेहर ....

सफ़र की सेहर .... 
यूँ सफ़र के सफ़र में हम शामिल हो रहे हैं ,
ज़िन्दगी की सेहर को पाने को कुछ इस तरह काबिल हो रहे हैं,
न जाने क्यूँ ये सेहर कभी रंगीन शाम बन जाती है ,
और फिर यही शाम हम पर ही बिफर भी जाती है ,
नहीं मालूम कि किस तरह इसे मनाऊं ?
किस तरह इसे सफ़र की सेहर से मिलाऊं ?
वक़्त जैसे थम रहा है इस सेहर से मिलने को ,
पर क्यूँ नहीं पता कि कौन - सा रास्ता है तैयार इस रस्ते से मिलने को ?
क्या पता कब आएगी वो शाम जहां होगा दीदार खुद से खुद का ?
और वाकिफ हूँ मैं खुद से इस तरह ,
जैसे कोई नावाकिफ हो खुद से जिस तरह ...........


शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता 

Tuesday, October 30, 2012

न जाने क्यूँ हम सोचते हैं!!!!!!!!!!!!!

 न जाने क्यूँ हम सोचते हैं!!!!!!!!!!!!!

न जाने क्यूँ हम अक्सर सोचते हैं
गम नही कि हम सोचते हैं ,
पर दिक्कत ये है कि हम सिर्फ दूसरों के बारे में सोचते हैं,
माना  कि  सोचना भी एक नशा है ,
सोचने लगे तो सोच -दर-सोच बस नई  तरह की बातें आती हैं,
बातें आती हैं तो आती हैं,
पर ऐसा क्यूँ कि  उन बातों में खुद का ज़िक्र ही नही होता ,
लगता है दूसरों को समझते - समझते हम खुद को भूल बैठे हैं ,
जैसे ज़िन्दगी की सच्चाइयों से कोई इंतकाम लिए बैठे हैं,
न जाने कैसी बेतकल्लुफी है पर आज दूसरों को बहुत जान गए हैं और खुद से अनजान हो गए हैं .........

शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता

Monday, October 29, 2012

आईना

आईना
ये आईना भी बड़ी अजीब चीज़ है,
कभी दिखता है कि  हम बड़े खुशनसीब हैं,
कभी दिखता है कि गम से भरे नसीब हैं ,
कभी मैं खुद को उसमें देखती हूँ ,
कभी किसी और को देखने की कोशिश करती हूँ ,
मालूम है कि ये नसफल कोशिश का हिस्सा है,
पर फिर भी ये कोशिश करती हूँ ,
शायद जिस वजूद को धुन्धने की कोशिश कर रही हूँ ,
वो इस आईने में ही मिल जाए ,
और खुद के वजूद में कुछ नै पहचान शामिल हो जाए,
पर क्या वो पहचान मेरी होगी?
इस सवाल से भी बहुत डरती हूँ,
फिर से आईने का सहारा लेती हूँ,
फिर खुद को जतलाती हूँ कि ये क्या बताएगा रास्ता ?
ये तो खुद इंसानों के हाथो के गधे जाने का है फलसफा ,
लेकिन फिर भी आईने के पास जाती हूँ,
किसी एक दिन नहीं हर रोज़ जाती हूँ,
अपने वजूद को अपनी पहचान को तलाशती हूँ ,
कुछ भी नहीं पति हूँ फिर भी आईने तक जाने की कवायद करती हूँ ......



शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता 

Sunday, October 28, 2012

मौसम

मौसम

मौसम आते भी हैं जाते भी हैं ,
कुछ खट्टी - मीठी यादें छोड़ जाते भी हैं
उन पलों पर नाज़ करो ऐ दोस्तों ,
मौसमों की बेरुखी को नासाज़ न करो  ऐ दोस्तों ,
क्या रखा है मौसमों की विरासत  लड़ने में , इस कंपकंपी के मौसम में चाय और पकौड़ो का मज़ा लो ऐ दोस्तों !!!!!!!!!!


शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता 

वो सब कुछ एक ही था!!!!!!

वो सब कुछ एक ही था!!!!!!
मैंने तारे गिने पर सूरज और चाँद तो केवल एक ही था ,
मैंने दिन और रात गिने पर वो हफ्ता , महिना और साल तो एक ही था,
ये सच है कि हम अक्सर हजारों की तलाश में खो जाते हैं ,
पर खुद को जो हमसे जोड़े कोई ऐसा शख्स तो केवल एक ही था ,
इस एक के खेल में मज़ा खूब है ,
कभी हम खुद को और कभी उन को इस खेल का नियम बताते हैं !!!!!!!
शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता 

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी


ज़िन्दगी न सिर्फ फलसफा है गिले शिकवों का ,  न खुशियों का इकलौता तराना है ,
ये ज़िन्दगी और जिंदगियों से मिल कर बुना एक ताना - बाना है ,
कहीं पर बंधी आशा की एक डोर है , कहीं निराशा का गूंजता शोर है ,
कुछ नए रिश्ते हैं,कुछ पुराने हैं,
कुछ दर्द से भरे तो कुछ स्नेह से जुड़े सहारे हैं ,
कुछ स्वार्थ पर टिके हैं , कुछ वक़्त की डुगडुगी पर टिके हैं,
रिश्तों के ये कच्चे धागे हैं , उन पर उनके टूट जाने के मंडराते साये हैं ,
बनते- बिगड़ते इस खेल में बहुत सी पनाहें हैं ,
जो अन्धेरें में भी प्रकाश के आभास का आगाज़ हैं

शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता

फ़िक्र

फ़िक्र 
फ़िक्र क्या जब फ़िक्र फ़िक्र रही ही नही ,
ज़िंदगी में फ़िक्र को तजुर्बे की तरह जब हमने शामिल कर लिया ,
फ़िक्र तब फ़िक्र रही नही और एक सीख दे गई ,
कुछ तजुर्बेकार शख्सियतें रहीं वक़्त क इस समय पर जो फ़िक्र फ़िक्र रही नही ......

शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता

समय बीत रहा है........

समय बीत रहा है........

अरे....अरे ....अरे ...पकड़ो ....पकड़ो ...
मत जाने दो ......उफ़ ....ओहो ....
सुना है हमने कहीं से कि समय बीत रहा है ,
अरे पकड़ लो इसे ये समय बीत रहा है ,
न जाने क्यूँ इतनी रफ़्तार से ये समय बीत रहा है ?
कहीं किसी की  गाड़ी छूट रही है ,
तो कहीं किसी की परीक्षा छूट रही है ,
और मालूम है ये सब क्यों हो रहा है??
अजी बस क्या कहूं?
ये सब समय की कारस्तानी है ,
आप कहेंगे भला समय की क्या कारस्तानी है?
अरे कारस्तानी यही कि बस ये मुआ समय बीत रहा है ,
हर कोई समय को कोस रहा है, 
कोई नौकरी को होती देरी से तो कोई बस छूटने से रो रहा है 
और ये सब समय बीतने की वजह से हो रहा है ,
सबको लगता है कि समय दौड़ रहा है ,
पर इस भागते समय को कोई पकड़ भी तो नहीं रहा है ,
अजी पकडे भी तो कैसे? वो चल नहीं दौड़ रहा है ,
जिस तरह हमारी ज़िन्दगी ढलती जाती है समय भी ढलता जाता है ,
फर्क दोनों में सिर्फ इतना है कि हमारी ढलती ज़िन्दगी एक दिन रुक जाती है,
पर ये ढलता समय बस बस ढलते ढलते भी दौड़ता जाता है,
मालूम ही नही हमें कोई नुस्खा इस मुलाजिम वक़्त को पकड़ने का ,
रोक कर रखने का, अपनी मर्ज़ी से चलाने का,
इसी  लिए तो मौका है वक़्त के पास भागते जाने का, 
और  हम सिर्फ एक सवाल के साथ हैं,
कैसे पकड़े इसे कि समय बीत रहा है ,
हमसे आगे कहीं निकल रहा है, कितनी दूर तलक भागे हम?
बस ये तो अपनी रफ़्तार पर अकेले ही चल रहा है,
हम सबको कहीं पीछे छोड़ रहा है ,
और मैं फिर से कहती हूँ कि पकड़ लो इसे ,
ये समय बीत रहा है,
ये समय हमसे छूट रहा है......


शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता