न जाने क्यूँ हम सोचते हैं!!!!!!!!!!!!!
न जाने क्यूँ हम अक्सर सोचते हैंगम नही कि हम सोचते हैं ,
पर दिक्कत ये है कि हम सिर्फ दूसरों के बारे में सोचते हैं,
माना कि सोचना भी एक नशा है ,
सोचने लगे तो सोच -दर-सोच बस नई तरह की बातें आती हैं,
बातें आती हैं तो आती हैं,
पर ऐसा क्यूँ कि उन बातों में खुद का ज़िक्र ही नही होता ,
लगता है दूसरों को समझते - समझते हम खुद को भूल बैठे हैं ,
जैसे ज़िन्दगी की सच्चाइयों से कोई इंतकाम लिए बैठे हैं,
न जाने कैसी बेतकल्लुफी है पर आज दूसरों को बहुत जान गए हैं और खुद से अनजान हो गए हैं .........
शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता
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