यूँ सफ़र के सफ़र में हम शामिल हो रहे हैं ,
ज़िन्दगी की सेहर को पाने को कुछ इस तरह काबिल हो रहे हैं,
न जाने क्यूँ ये सेहर कभी रंगीन शाम बन जाती है ,
और फिर यही शाम हम पर ही बिफर भी जाती है ,
नहीं मालूम कि किस तरह इसे मनाऊं ?
किस तरह इसे सफ़र की सेहर से मिलाऊं ?
वक़्त जैसे थम रहा है इस सेहर से मिलने को ,
पर क्यूँ नहीं पता कि कौन - सा रास्ता है तैयार इस रस्ते से मिलने को ?
क्या पता कब आएगी वो शाम जहां होगा दीदार खुद से खुद का ?
और वाकिफ हूँ मैं खुद से इस तरह ,
जैसे कोई नावाकिफ हो खुद से जिस तरह ...........
शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता
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