Sunday, October 28, 2012

समय बीत रहा है........

समय बीत रहा है........

अरे....अरे ....अरे ...पकड़ो ....पकड़ो ...
मत जाने दो ......उफ़ ....ओहो ....
सुना है हमने कहीं से कि समय बीत रहा है ,
अरे पकड़ लो इसे ये समय बीत रहा है ,
न जाने क्यूँ इतनी रफ़्तार से ये समय बीत रहा है ?
कहीं किसी की  गाड़ी छूट रही है ,
तो कहीं किसी की परीक्षा छूट रही है ,
और मालूम है ये सब क्यों हो रहा है??
अजी बस क्या कहूं?
ये सब समय की कारस्तानी है ,
आप कहेंगे भला समय की क्या कारस्तानी है?
अरे कारस्तानी यही कि बस ये मुआ समय बीत रहा है ,
हर कोई समय को कोस रहा है, 
कोई नौकरी को होती देरी से तो कोई बस छूटने से रो रहा है 
और ये सब समय बीतने की वजह से हो रहा है ,
सबको लगता है कि समय दौड़ रहा है ,
पर इस भागते समय को कोई पकड़ भी तो नहीं रहा है ,
अजी पकडे भी तो कैसे? वो चल नहीं दौड़ रहा है ,
जिस तरह हमारी ज़िन्दगी ढलती जाती है समय भी ढलता जाता है ,
फर्क दोनों में सिर्फ इतना है कि हमारी ढलती ज़िन्दगी एक दिन रुक जाती है,
पर ये ढलता समय बस बस ढलते ढलते भी दौड़ता जाता है,
मालूम ही नही हमें कोई नुस्खा इस मुलाजिम वक़्त को पकड़ने का ,
रोक कर रखने का, अपनी मर्ज़ी से चलाने का,
इसी  लिए तो मौका है वक़्त के पास भागते जाने का, 
और  हम सिर्फ एक सवाल के साथ हैं,
कैसे पकड़े इसे कि समय बीत रहा है ,
हमसे आगे कहीं निकल रहा है, कितनी दूर तलक भागे हम?
बस ये तो अपनी रफ़्तार पर अकेले ही चल रहा है,
हम सबको कहीं पीछे छोड़ रहा है ,
और मैं फिर से कहती हूँ कि पकड़ लो इसे ,
ये समय बीत रहा है,
ये समय हमसे छूट रहा है......


शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता

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