ज़िन्दगी न सिर्फ फलसफा है गिले शिकवों का , न खुशियों का इकलौता तराना है ,
ये ज़िन्दगी और जिंदगियों से मिल कर बुना एक ताना - बाना है ,
कहीं पर बंधी आशा की एक डोर है , कहीं निराशा का गूंजता शोर है ,
कुछ नए रिश्ते हैं,कुछ पुराने हैं,
कुछ दर्द से भरे तो कुछ स्नेह से जुड़े सहारे हैं ,
कुछ स्वार्थ पर टिके हैं , कुछ वक़्त की डुगडुगी पर टिके हैं,
रिश्तों के ये कच्चे धागे हैं , उन पर उनके टूट जाने के मंडराते साये हैं ,
बनते- बिगड़ते इस खेल में बहुत सी पनाहें हैं ,
जो अन्धेरें में भी प्रकाश के आभास का आगाज़ हैं
शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता
No comments:
Post a Comment