ये आईना भी बड़ी अजीब चीज़ है,
कभी दिखता है कि हम बड़े खुशनसीब हैं,
कभी दिखता है कि गम से भरे नसीब हैं ,
कभी मैं खुद को उसमें देखती हूँ ,
कभी किसी और को देखने की कोशिश करती हूँ ,
मालूम है कि ये नसफल कोशिश का हिस्सा है,
पर फिर भी ये कोशिश करती हूँ ,
शायद जिस वजूद को धुन्धने की कोशिश कर रही हूँ ,
वो इस आईने में ही मिल जाए ,
और खुद के वजूद में कुछ नै पहचान शामिल हो जाए,
पर क्या वो पहचान मेरी होगी?
इस सवाल से भी बहुत डरती हूँ,
फिर से आईने का सहारा लेती हूँ,
फिर खुद को जतलाती हूँ कि ये क्या बताएगा रास्ता ?
ये तो खुद इंसानों के हाथो के गधे जाने का है फलसफा ,
लेकिन फिर भी आईने के पास जाती हूँ,
किसी एक दिन नहीं हर रोज़ जाती हूँ,
अपने वजूद को अपनी पहचान को तलाशती हूँ ,
कुछ भी नहीं पति हूँ फिर भी आईने तक जाने की कवायद करती हूँ ......
शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता
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