Wednesday, November 14, 2012

रिश्ते ....

रिश्ते ....
रिश्ते अहसास हैं ,
कभी लगते हैं दूर तो कभी पास हैं ,
क़रीब हो तो उनकी कद्र नहीं होती ,
दूर हो तो उन्हें ढूंढ़ती हैं निगाहें ,
कभी छूने पर बिखर जाते हैं ,
कभी सँभालने से टूट जाते हैं ,
फिर भी रिश्ते रिश्ते ही कहलाते हैं ,
नादाँ हैं हम जो इनकी अहमियत नहीं समझते ,
खुद में ही उलझे रहते हैं उम्र भर ......


शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता 

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सच ....

सच ....
ये किस्सा नहीं कोई बल्कि सोलह आने सच है ,
बहुत ख़ूबसूरत ये इंद्रधनुषी सच है ,
न लापता हो जाए ये स्नेहिल सच है ,
और सच कहे तो ये अपने मन में सजा कर रखने सी अजीज़ है ....

शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता

खोना और पाना .....

खोना और पाना .....
यूँ खोना नहीं कहते इस खोने को ,
 पर हाँ पाने की शिद्दत से ये खोना ज़रूर बना है ,
 लफ़्ज़ों की जो तकरार है वो बन गया इकरार है ,
यूँ लफ़्ज़ों को न बेकार जाने दो ,
यूँ खोने में ही खुद को पाने दो .....

शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता

कही जो तुमने दिल की बात .....

कही जो तुमने दिल की बात .....
कही जो तुमने दिल की बात ,
निगाहों से उतर कर दिल में बस गई ,
ये खोने से पाने और पाने से खोने की खुमारी हम पर चढ़  गई ,
नाबाद है ये दिल इस गुलिस्तान से ,
क्योंकि दस्तक दी है हमारे दिल पर पर तुम्हारी दास्ताँ ने ....


शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता 

रफ़्तार में .....

रफ़्तार में .....

रफ्तारें जो ज़िन्दगी की रफ्तारों से न जुड़ सकी ,
न मालूम किस तरह एक हदबंदी हमारे भी जिम्मे हो गई ,
हो जाते हम भी फ़ना  इन रफ्तारों की रफ़्तार में ,
ग़र पाया न होता खुद को इस ज़िन्दगी की रफ़्तार में ,
ये लफ्ज़ जो इस कदर रफ़्तार में बह रहे हैं,
न जाने क्यूँ किसी की रफ़्तार से नहीं जुड़ रहे हैं ,
क्या खता हो गई है हमारी रफ़्तार में,
जैसे खफा हो गए हम इस रफ़्तार की रफ़्तार में,
जो चल पाता कोई नुस्ख़ा इस रफ़्तार का ,
तो खो देती शायद खुद को पाने का नुस्खा इस रफ़्तार में,
पर खुश हूँ कि पा गई खुद को इस रफ़्तार में ,
तो डर नहीं किसी से इस बेवफ़ा रफ़्तार में .....


शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता 

Friday, November 2, 2012

दिल से दिल की बात ....

दिल से दिल की बात ....
बातों ही बातों में कुछ ऐसी बात हो गई ,
पता नहीं किस तरह ये दिल का गहरा राज़ हो  गई ,
जो जाना इन अल्फाजों से इस गहराई को,
तो दिल की दिल से बात हो गई .....

शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता

यादों का अफ़साना...........

यादों का अफ़साना............
यादें अफसाना है रंग - बिरंगे तरानों का,
ताउम्र जूझती सूझती ज़िन्दगी के अल्फाजों का,
कभी तुम्हारी - हमारी दोस्ती को जो लौटा देती यादें,
तो दिल को छू जाती वो यादें,
वक़्त के पहलुओं में सिमटती ये यादें ,
वक़्त के पहिये पर झूलती ये यादें ,
कभी जो याद करूँ पिछली उन यादों को ,
तो तरोताज़ा हो जाता है मन तुम्हारी यादों से,
फिर एक फ़िक्र सी होना तुम्हारी ,
पर तुम्हें कुछ न कह पाना ,
पर मन ही मन तुम्हारी सलामती के लिए दुआ करना ,
और फिर तुम्हारी खिलखिलाती आवाज़ को सुनने के लिए बरबस एक ख्याल आना ,
हाँ ये दोस्ती कुछ खास है ,
तुमसे जुड़ा अपनेपन का एहसास है ,
है यही कामना मेरी ,
कि सलामत रहे ये प्यारी सी दोस्ती हमारी ,
गुलज़ार रहे हमारा गुलिस्तान तुम्हारी खिलखिलाती बातों से ,
और न गुमने पाए ये लम्हा जो जुड़ा है तुम्हारे एहसास से ..........

शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता 

ये उलझनें..........

ये उलझनें
ये उलझनें.......ये उलझनें,
दोहराती हमारे ख्यालों को उलझनें ,
बनती - बिगडती और फिर से ख्यालों के समंदर पर स्वर होती ये उलझनें ,
उफ़ कैसी ये उलझनें ,
कभी लगता है कि  दिल है सही ,
तो कभी लगता है कि दिमाग भी कम तो नहीं ,
सुनूँ किसकी किस को नकारुं ,
इस पर भी रहती उलझनें ,
पर हैं ज़रूरी ये उलझनें खुद को टटोलने के लिए ,
वक़्त को टटोलने के लिए ,
और सच कहूँ तो उलझनों को टटोलने के लिए ............

शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता

तमन्ना

तमन्ना
तमन्नाओं के सफ़र में वजूद कुछ तमन्नाओं का अलग होता है ,
अपने आप का एहसास भी तब उन तमन्नाओं में धुला होता है,
ये तमन्ना जो दिन के चैन और रात की नींद पर सवार होती है ,
 ना मालूम की किस तरह उस तमन्ना को पाने जी जुस्त शुरू होती है ....
शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता

किताबें..................

किताबें..................
किताबें कुछ कहना चाहती हैं ,
तुमसे बातें करना चाहती हैं,
कुछ लफ़्ज़ों में सब कुछ बयां करना चाहती है ,
देखो ज़रा खोल क इन्हें ,
वो तुम्हें नई दुनिया दिखाना चाहती है ......
शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता

इत्तेफाक़ का सफ़र .....

इत्तेफाक़  का सफ़र .....
इत्तेफ़ाक से खुद का जो एहसास है वो दूसरों से कही ज्यादा खास है ,
अक्सर खुद का ये एहसास नज़रबंद हो जाता है ,
दूसरों के साथ जीते हुए गुमनामी में कही खो जाता है ,
अब खुद से जो बंदगी कर पाई हूँ तो ,
लगता है कि ज़िन्दगी में जिसकी कमी थी उसे जान पी हूँ ,
ये एहसास न फिर से खोने पाए ,
ज़िन्दगी की डगर पर ये मुझसे कुछ इस तरह जुड़ जाए ,
हाँ जूझती इस ज़िन्दगी में खुद से दूर जो हुई थी ,
इत्तेफ़ाक़ से सूझती ज़िन्दगी ने इस लम्हे को फिर से हासिल किया था ,
जो पाया ये लम्हा तो हमसफ़र बन गया ,
अपने सफ़र में मैं मुझसे जुड़ गया ..................

शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता

Thursday, November 1, 2012

अदृश्य खाई ...

अदृश्य खाई ...
आज देखा कुछ ऐसा ख़ास जो देखा मैंने पहले भी कई बार ,
न जाने क्यूँ मैं खासम - ख़ास अब तक न देख पाई,
या यूँ कहे की अब से पहले मैं इसे समझ ही न पाई ,
दास्ताँ ये कुछ औरतों की है ,
समाज के कुछ अनदेखे होते पहलुओं की है ,
रिक्शा जो लिया तो घर की ओर बढ़ने लगी घर की ओर ,
और पल भर में ही न जाने कहाँ से सुनाई दिया कुछ शोर ,
जो झाँका मैंने कुछ इधर - उधर ,
तो दिखाई दी एक स्त्री जो अपने मुँह को कपडे से ढांपे हुए थी ,
बैठी हुई थी वो पत्थरों के ढेर पर ,
और ले हथौड़ा या  कभी - कभी एक लेकर ईंट तोड़ रही थी पत्थर ,
मैं कर भी क्या सकती थी , पहले भी अनदेखा किया है ,
आज फिर से अनदेखा कर मैं आगे बढ़ने लगी थी और हवा से बातें होने लगी थी ,
अगले पल को जो बरबस घूमी मेरी नज़र ,
दिखाई दी मुझे मुझ को घूरती एक नज़र ,
नज़रें एक स्त्री की थी जो कपड़ों पर इस्तरी फेर रही थी और कनखियों से मुझे देख रही थी ,
अगले पल को मैंने उस से भी ध्यान हटाया ,
और चाहा की मेरी नज़र देखे कुछ और ,
और इस तरह कुछ और की तलाश में मुझे एक और स्त्री नज़र आई ,
इस बार भी वह स्त्री कामकाजी थी अन्य दो की तरह ,
पर मिजाज़ उसके कुछ अलग से थे ,
या यूँ कहें की ठाठ - बाट  उसके कुछ अलग से थे ,
फिर बरबस खुद का ध्यान आ गया और मैंने ये किस्सा खुद पर ही ख़त्म कर दिया,
न जाने कैसा है ये अलग अंदाज़ ज़िन्दगी का ,
बना है ये क्यूँ गहरा राज़ ज़िन्दगी  का ,
क्यूँ ऐसा है कि काम तो सब करते हैं ,
पर सभी काम एक सा सम्मान पाते नहीं ,
न जाने क्यूँ वो तीनों अलग थी पर मैं किसी को अलग सा देख पाई नहीं ,
मेरी नज़र में तीनो औरतें थी ,
हाँ काम भिन्न थे,
पर काम के प्रति निष्ठा समान थी  ,
फिर वर्चस्व की लड़ाई क्यूँ ,
फिर छोटे - बड़े काम की बात क्यूँ ,
क्यूँ एक पत्थर तोड़ती है पर मजदूरों की श्रेणी में आती है,
क्यूँ दूसरी इस्तरी करती है पर दो चवन्नी ही पाती है ,
और क्यूँ एक सड़कों की कालीन को अपनी मर्सिडीज़ से ही नापती है ,
ये प्रश्न है या कौतूहल ,
इस सब का जवाब मेरे पास होकर भी नहीं है ,
और न इस गहराई के समंदर में उतर कर जवाब ही ले आने का जिगरा ही है ,
कुछ तो रहमत ऐसी हो जाए ,
ज़िन्दगी लोगों की लोगों से मिल जाए ,
बड़े और छोटे कहकर जो बनाई गई है एक अदृश्य खाई ,
कभी तो किसी  पुल के सहारे ही पट जाए ...........

शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता