अदृश्य खाई ...आज देखा कुछ ऐसा ख़ास जो देखा मैंने पहले भी कई बार ,
न जाने क्यूँ मैं खासम - ख़ास अब तक न देख पाई,
या यूँ कहे की अब से पहले मैं इसे समझ ही न पाई ,
दास्ताँ ये कुछ औरतों की है ,
समाज के कुछ अनदेखे होते पहलुओं की है ,
रिक्शा जो लिया तो घर की ओर बढ़ने लगी घर की ओर ,
और पल भर में ही न जाने कहाँ से सुनाई दिया कुछ शोर ,
जो झाँका मैंने कुछ इधर - उधर ,
तो दिखाई दी एक स्त्री जो अपने मुँह को कपडे से ढांपे हुए थी ,
बैठी हुई थी वो पत्थरों के ढेर पर ,
और ले हथौड़ा या कभी - कभी एक लेकर ईंट तोड़ रही थी पत्थर ,
मैं कर भी क्या सकती थी , पहले भी अनदेखा किया है ,
आज फिर से अनदेखा कर मैं आगे बढ़ने लगी थी और हवा से बातें होने लगी थी ,
अगले पल को जो बरबस घूमी मेरी नज़र ,
दिखाई दी मुझे मुझ को घूरती एक नज़र ,
नज़रें एक स्त्री की थी जो कपड़ों पर इस्तरी फेर रही थी और कनखियों से मुझे देख रही थी ,
अगले पल को मैंने उस से भी ध्यान हटाया ,
और चाहा की मेरी नज़र देखे कुछ और ,
और इस तरह कुछ और की तलाश में मुझे एक और स्त्री नज़र आई ,
इस बार भी वह स्त्री कामकाजी थी अन्य दो की तरह ,
पर मिजाज़ उसके कुछ अलग से थे ,
या यूँ कहें की ठाठ - बाट उसके कुछ अलग से थे ,
फिर बरबस खुद का ध्यान आ गया और मैंने ये किस्सा खुद पर ही ख़त्म कर दिया,
न जाने कैसा है ये अलग अंदाज़ ज़िन्दगी का ,
बना है ये क्यूँ गहरा राज़ ज़िन्दगी का ,
क्यूँ ऐसा है कि काम तो सब करते हैं ,
पर सभी काम एक सा सम्मान पाते नहीं ,
न जाने क्यूँ वो तीनों अलग थी पर मैं किसी को अलग सा देख पाई नहीं ,
मेरी नज़र में तीनो औरतें थी ,
हाँ काम भिन्न थे,
पर काम के प्रति निष्ठा समान थी ,
फिर वर्चस्व की लड़ाई क्यूँ ,
फिर छोटे - बड़े काम की बात क्यूँ ,
क्यूँ एक पत्थर तोड़ती है पर मजदूरों की श्रेणी में आती है,
क्यूँ दूसरी इस्तरी करती है पर दो चवन्नी ही पाती है ,
और क्यूँ एक सड़कों की कालीन को अपनी मर्सिडीज़ से ही नापती है ,
ये प्रश्न है या कौतूहल ,
इस सब का जवाब मेरे पास होकर भी नहीं है ,
और न इस गहराई के समंदर में उतर कर जवाब ही ले आने का जिगरा ही है ,
कुछ तो रहमत ऐसी हो जाए ,
ज़िन्दगी लोगों की लोगों से मिल जाए ,
बड़े और छोटे कहकर जो बनाई गई है एक अदृश्य खाई ,
कभी तो किसी पुल के सहारे ही पट जाए ...........
शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता