रिश्ते अहसास हैं ,
कभी लगते हैं दूर तो कभी पास हैं ,
क़रीब हो तो उनकी कद्र नहीं होती ,
दूर हो तो उन्हें ढूंढ़ती हैं निगाहें ,
कभी छूने पर बिखर जाते हैं ,
कभी सँभालने से टूट जाते हैं ,
फिर भी रिश्ते रिश्ते ही कहलाते हैं ,
नादाँ हैं हम जो इनकी अहमियत नहीं समझते ,
खुद में ही उलझे रहते हैं उम्र भर ......
शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता
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