रफ्तारें जो ज़िन्दगी की रफ्तारों से न जुड़ सकी ,
न मालूम किस तरह एक हदबंदी हमारे भी जिम्मे हो गई ,
हो जाते हम भी फ़ना इन रफ्तारों की रफ़्तार में ,
ग़र पाया न होता खुद को इस ज़िन्दगी की रफ़्तार में ,
ये लफ्ज़ जो इस कदर रफ़्तार में बह रहे हैं,
न जाने क्यूँ किसी की रफ़्तार से नहीं जुड़ रहे हैं ,
क्या खता हो गई है हमारी रफ़्तार में,
जैसे खफा हो गए हम इस रफ़्तार की रफ़्तार में,
जो चल पाता कोई नुस्ख़ा इस रफ़्तार का ,
तो खो देती शायद खुद को पाने का नुस्खा इस रफ़्तार में,
पर खुश हूँ कि पा गई खुद को इस रफ़्तार में ,
तो डर नहीं किसी से इस बेवफ़ा रफ़्तार में .....
शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता
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