Wednesday, April 16, 2025

दिमाग या नदी

किसे फिक्र है कि आसपास या ख़ुद के भीतर क्या चल रहा है?
लेकिन मैं जानती हूं कि जो चल रहा है वह कभी-कभी दिमाग को बिल्कुल सुस्त बना देता है 
दिमाग के भीतर एक छोटी सी नदी है और वह नदी लगातार बह रही है।
कभी थोड़ी सूख जाती है तो कभी फिर से उसमें पानी का स्तर बढ़ जाता है
कभी इसकी कलकल और कलरव से दिमाग को सुकून आता है
और कभी यही कलकल कोलाहल हो जाता है
दिमाग भी क्या चीज़ है
नदी की तरह लगातार बहता रहता है
फिर एक दिन ऐसा भी होगा कि न नदी रहेगी न दिमाग और न दिमाग को रखता ये शरीर

No comments:

Post a Comment