Monday, March 11, 2024

अनछुआ रिश्ता

नहीं सोचा कि छुऊँ भी तुम्हें रत्ती सा
नहीं सोचा कि छू लो तुम मुझे बित्ता सा
ये अनछुआ सा जो रिश्ता है
दरम्यान हमारे बहुत कुछ कहता है
मैं चाहती हूँ कि ये रहे यूँ ही अनछुआ सा ।

सस्नेह निशु

मेरी पहली प्रेम कविता

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