नहीं सोचा कि छुऊँ भी तुम्हें रत्ती सा नहीं सोचा कि छू लो तुम मुझे बित्ता सा ये अनछुआ सा जो रिश्ता है दरम्यान हमारे बहुत कुछ कहता है मैं चाहती हूँ कि ये रहे यूँ ही अनछुआ सा ।
सस्नेह निशु
मेरी पहली प्रेम कविता
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