Monday, March 11, 2024

आज़ादी के माने

सोचती थी मैं भी हर साल
पर कह नहीं पाती थी,
आज़ादी के माने क्या हैं
ये समझ न पाई थी,
फिर एक दिन बच्चों ने पूछे वही सवाल
ढूँढ़ रही थी मैं भी जिनके
गहरे और सटीक जवाब,
पूछा उन्होंने कि 'दीदी, आज़ादी है क्या?
सिर्फ़ एक दिन ही क्यों मनती है?
और फिर पूछा उन्होंने कि
'क्या कुछ भी करना आज़ादी है?'
और फिर आया एक और सवाल
जब करते सब मनमानी
तो होती दूसरों को परेशानी
तो क्या आज़ादी एक परेशानी है?
गहरी सोच में फिर से डूब गई थी मैं,
आज़ादी सच में क्या है
खोज रही थी मैं,
फिर कहा मैंने,
आज़ादी , आज़ादी के माने
बहुत हैं,
सोचो तो ये हर पल में अलग है,
मसलन, पंछी का उड़ना,
पत्तों का हिलना,
हवा का बहना,
सूरज का हर दिन उगना,
और फिर फिर ढलना,
आज़ादी हम सबसे जुड़ी है,
ये रिश्तों की अहम् कड़ी है,
आज़ादी से कर्त्तव्य जुड़े हैं,
सोचो तो ये बहुत बड़े हैं,
आज़ादी है एक ज़िम्मेदारी,
न सम्भालो इसे तो
बन जाती ये परेशानी है ।

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