Friday, November 2, 2012

इत्तेफाक़ का सफ़र .....

इत्तेफाक़  का सफ़र .....
इत्तेफ़ाक से खुद का जो एहसास है वो दूसरों से कही ज्यादा खास है ,
अक्सर खुद का ये एहसास नज़रबंद हो जाता है ,
दूसरों के साथ जीते हुए गुमनामी में कही खो जाता है ,
अब खुद से जो बंदगी कर पाई हूँ तो ,
लगता है कि ज़िन्दगी में जिसकी कमी थी उसे जान पी हूँ ,
ये एहसास न फिर से खोने पाए ,
ज़िन्दगी की डगर पर ये मुझसे कुछ इस तरह जुड़ जाए ,
हाँ जूझती इस ज़िन्दगी में खुद से दूर जो हुई थी ,
इत्तेफ़ाक़ से सूझती ज़िन्दगी ने इस लम्हे को फिर से हासिल किया था ,
जो पाया ये लम्हा तो हमसफ़र बन गया ,
अपने सफ़र में मैं मुझसे जुड़ गया ..................

शुक्रिया,
सस्नेह,
निशु गुप्ता

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