वो बारिश की पहली बूँदें ,
वो मिटटी की पहली खुशबू ,
वो खनकती आवाज़ बूंदों के गिरने की ,
महक को साथ लाती हैं ,
एक अर्से तक याद करती हूँ मैं ये दिनजब बैठूंगी खिड़की के अहाते में ,
और आँखें बंद करके सुनूंगी ये आवाज़ ,
और वो महक मिटटी के साथ चली आएगी ,
बस यही होगा उस समय का शाश्वत सत्य
सस्नेह
निशु
वो मिटटी की पहली खुशबू ,
वो खनकती आवाज़ बूंदों के गिरने की ,
महक को साथ लाती हैं ,
एक अर्से तक याद करती हूँ मैं ये दिनजब बैठूंगी खिड़की के अहाते में ,
और आँखें बंद करके सुनूंगी ये आवाज़ ,
और वो महक मिटटी के साथ चली आएगी ,
बस यही होगा उस समय का शाश्वत सत्य
सस्नेह
निशु
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