Thursday, July 10, 2014

in makaano mein...

इन मकानों में कुछ इंसान रहते हैं।
इन मकानों में कुछ समाज रहते हैं।
इन मकानों में कुछ भाव रहते हैं।
ये मकान ही वो घर हैं जहाँ तुम और हम रहते हैं।
इन घरों में बहुत झरोखे हैं,
जहां से दूर कहीं हम देख सकें।
जहाँ से पास कहीं झांक सकें।
न केवल मकानों या घरों में
कुछ दिलों के दरीचो और दरियाओं में।
ज्यों सुबह होने को है त्यों सूरज भी चढ़ने को है।
आंखें जो खुल कर भी बंद है,
उसे भी अब सवाल है,
क्यों महरूम किया है उन्हें,
क्यों मसरूफ किया है उन्हें,
कि वो देख भी न सकें कि
आँखों का धुंधलका हटने को है।
निशु

No comments:

Post a Comment