Saturday, July 19, 2014

qayada - beqayada

कायदों के शहर में बेकायदा हो रहे हैं हम,
जैसे समंदर की तली पर कोई घर खोज रहे हम ,
क्यों धरती पर रहना रास नही आ रहा,
कभी आसमान का परिंदा और कभी समंदर की जलपरी बने ह हम,
खुद को बुलाती हूँ कि आ लौट चलें फिर तहजीब के नगर मे,
पर क्यों ऐसा है कि खुद की आवाज़ भी नहीं सुन रहे हम ,
लगता है जैसे सुना अनसुना हुआ ह,
शमशान में जैसे कोई मुर्दा बोलता ह,
रह गई थी शायद उसकी कोई इच्छा ,
यूँ मरकर उसे पूरा कर रहा है
लोग रो रहे हैं उसके मरने पर,
पर न जाने कौन सी ख़ुशी है
कि नाचता ह वो खुद के मरने पर।
निशु

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